उत्तराखंड में बागवानी से भी चमक सकती है आपकी किस्मत !

Mission Mera Gaon आपको हमेशा ऐसे लोगों की सच्ची कहानियां बताता है जिससे न सिर्फ उत्तराखंड की असली खुशबू महकती है बल्कि समाज में एक नई चेतना का भी संचार होता है। आज मिलिए अस्सी साल से ज्यादा की उम्र पार कर चुके मंगलानंद डबराल से, जिन्होंने बागवानी के क्षेत्र में जो रोशनी दिखाई है उस पर हमारे ग्रामीण युवकों को चलना ही चाहिए, सीखना ही चाहिए।

मंगलानंदजी ने कीवी फ्रूट की फसल बड़ी ही कामयाबी के साथ उगायी है । खास बात कीवी के फल को बंदर नहीं खाता क्योंकि ये बहुत खट्टा होता है। तोड़ने के बाद पकता है केले की तरह। यही नहीं कीवी, आड़ू, पुलम, खुबानी, सेब, अखरोट और कई सब्जियों के साथ कई नए और शानदार प्रयोग किये हैं।

20 साल पहले वो खाड़ी देशों में नौकरी छोड़ घर लौटे और फिर खेती में ही रम गए। आज उत्तराखंड में बागवानी के क्षेत्र में उनका अलग काम और नाम है। अपने बेटों के साथ वो अपना ये काम और आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बागवानी के साथ डिब्बाबंद अचार, चटनी और जूस का काम भी काफी आगे बढ़ा दिया है।

उनकी कामयाबी इस बात की मिसाल है कि अगर थोड़ी मेहनत और ज्यादा दिमाग लगाया जाए तो 20 से 50 हजार रु महीना आमदनी के लिए तो गांव छोड़ने की बिलकुल जरूरत नहीं पड़ेगी। और अगर चकबंदी हो जाये तो ये कोशिश और भी सार्थक साबित होगी।

बागवानी पलायन रोकने का भी एक अचूक उपाय साबित होगा। उत्तराखंड के कुछ युवाओं ने इस दिशा में पहल भी की है लेकिन इस पहल को क्रांति में बदलने के लिए हजारों युवकों को अपने खेतों में उतरना होगा। अगर सरकार सार्थक प्रयास करे तो और बेहतर होगा….ये पहाड़ की खुशकिस्मती है कि उसके पास मंगलानंद डबराल जैसे नायक मौजूद हैं।

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