गंगा मैया के प्रदेश में जल संकट से लड़ने वाली महिलाओं की सफल कहानी जानिए

उत्तरकाशी के जामक और जखोल गांव की महिलाओं ने सामूहिक परिश्रम से जल संरक्षण कर एक मिसाल कायम की है। इस सराहनीय काम से सिर्फ इन दोनों गांव के परिवारों की प्यास ही नहीं बुझ रही है बल्कि उस क्षेत्र के जल स्रोत भी रिचार्ज हो रहा है।

जल संरक्षण के इस प्रबंधन में इन गांवों की मदद और जानकारी एक बड़े NGO की फाउंडेशन ने की। 1991 में उत्तराखंड विनाशकारी भूकंप आया था, जिससे पहाड़ों में कई जगहों पर भारी जान-माल का नुकसान हुआ था। तब पहली बार जामक चर्चाओं में आया था।

उत्तरकाशी से 16 किमी. दूर जामक गांव में भूकंप की वजह से काफी नुकसान हुआ था। उस भूकंप ने कई घरों को तो तबाह किया था, साथ ही 76 लोगों की जान भी ले ली थी। भूकंप की वजह से इस गांव में पानी का संकट बढ़ गया था,

साल 2016 तक गांव वाले ऐसे ही पानी की कमी से जूझते रहे। गांव की महिलाएं ने एक योजना बनाई और उसे पूरा करने का जिम्मा खुद ही उठा लिया। गांव की महिलाओं ने ‘मां राजराजेश्वरी ग्राम कृषक समिति’ का गठन किया। इस समिति की अध्यक्ष अमरा देवी बताती हैं कि इस पानी के प्रबंधन को पूरा करने में छह महीने लगे।

जखोल गांव का जल संरक्षण

छह महीने तक गांव की हर महिला ने मेहनत की और तब ये जाकर ये योजना पूरी हुई। आज उस मेहनत का फल इस गांव को मिल रहा है। रोजना 70 लीटर से अधिक पानी यहीं से लेते हैं, अब उन्हें पानी के लिए भटकना नहीं पड़ता है।  जामक गांव की तरह ही जखोल गांव की 50 महिलाओं ने भी जल संरक्षण किया।

ये योजना जामक गांव की तुलना में छोटी है, लेकिन इस गांव के लिए पर्याप्त है। इस गांव के लोग भी पानी की कमी से जूझ रहे थे। उत्तरकाशी से 60 किलोमीटर दूर बसा जखोल गांव में पानी के संकट से निपटने के लिए योजना जनवरी 2019 में बनाई। इस गांव की महिलाओं ने पानी के संकट को हल करने वाली इस योजना में खूब मेहनत की। महिलाओं ने काम को संचालित करने के लिए ‘मां दुर्गा ग्राम कृषक समिति’ का गठन किया। इस लेख का मकसद सिर्फ यही है कि पहाड़ पर ज़िन्दगी कठिन भले हो लेकिन सरकारी योजनाओं का मोह ताकते रहना भी बुद्धिमानी नही कही जाएगी…अगर आपने हौसला दिखाया तो निश्चित ही सफलता आपको मिलेगी।

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