जानिए ,आखिर क्यों पहाड़ की लड़कियों ने तैयार की एक खास आर्मी ?

पहाड़ों में नृत्य संगीत के माध्यम से युद्ध-कला का प्रदर्शन बहुत पहले हुआ करता था। नई बात ये है कि अब ये जौहर लड़कियां दिखा रही हैं। गढ़वाल में लड़कियों का पहला म्यूज़िकल बैंड देश में अपने आप में अनोखा हैं। सरैयां नृत्य के नाम पर इस बैंड का नाम ‘सरैयां बैंड’ रखा गया है।

ये बैंड पौड़ी के सुधीर सुंद्रियाल की कल्पना का ख़बूसूरत नतीजा है। मिशन मेरा गाँव को सूत्रों ने बताया कि सरैयां नृत्य शादी-ब्याह में किया जाता था। जिसमें पुरुष ही हिस्सा लेते थे। उनकी एक ख़ास किस्म की वर्दी होती है। ये वीर रस का नृत्य है। हाथ में ढाल-तलवार लेकर युद्ध कला दिखाने वालों को सरैयां कहते हैं। वक्त के साथ धीरे-धीरे ये परंपरा खत्म हो रही है। तो महिला सरैयां बैंड के माध्यम से इस परंपरा को जगाए रखने और महिला सशक्तीकरण को नई ऊंचाई देने का विचार आया।

इस बैंड को बनाने में एक मुश्किल ये भी थी कि सरैयां पहले दलित समुदाय के लोग ही हुआ करते थे। इसीलिए गांव के लोगों को पहले तो लड़कियों के लिए इस विचार को लेकर आपत्ति थी। फिर जाति को लेकर भी आपत्ति जताई गई कि जो कार्य दलित समुदाय किया करता था, उसके लिए हमारी बेटियों को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं। बाद में सरैयां महिला बैंड ने जातिवाद और लैंगिक भेदभाव की दीवार, दोनों को तोड़ने की कोशिश की है। महिला सरैयां को वर्ष 2017 में लॉन्च किया था। फिर इसे बैंड के रूप में सामने लाने का विचार आया। जिसमें लड़कियां ढोल-दमाऊं, नगाड़े, मसकबीन सब बजाती हैं। फिलहाल इस सरैयां बैंड में पांच लड़कियां हैं। जिनमें से दो सरैयां हैं और तीन लड़कियां बैंड में हैं। वे परंपरागत वाद्ययंत्रों को बजाती हैं।

सरैयां बैंड में युद्ध कला का कौशल दिखाने वाली नेहा बुडाकोडी चरगाड गांव की हैं। उनकी दूसरी साथी अमीषा भी इसी गांव की हैं। नेहा बीएससी की छात्रा हैं। सरैयां के बारे में बात करते हुए उनकी आवाज़ खनकती है। नेहा कहती हैं कि हमने कभी कोई महिला सरैयां देखी ही नहीं, न कभी इसके बारे में सोचा। सुधीर सुंद्रियाल को वह मामा कहती हैं। नेहा के मुताबिक मामा जी ने उनका हौसला बढ़ाया। फिर कुछ झिझक के साथ उन्होंने इसके लिए हामी भर दी। वो कहती है कि आपको पीछे ढकेलने वाले बहुत लोग होते हैं लेकिन यहां एक नये रास्ते पर आगे बढ़ने का मौका था। उन्होंने थोड़ी हिम्मत जुटायी और बैंड की तैयारी शुरू कर दी। नेहा बताती हैं कि सरैयां बनने से पहले उन्होंने इसके बारे में जानकारी जुटायी। घर के बुजुर्गों से बात की।

वो कहती है कि हमारा गढ़वाल 52 गढ़ का देश कहा जाता है। पुराने समय में जब लड़ाइयां छिड़ती थीं, तो वीरों का उत्साह वर्धन करने के लिए सरैयां जाते थे। फिर धीरे धीरे ये परंपरा मनोरंजन के रूप में सामने आई। फिर पता चला कि कभी कोई लड़की सरैयां नहीं बनी। लेकिन जब उन्होंने अपने बैंड के साथ परफॉरमेंस दी, तो बहुत अच्छा लगा। नेहा कहती है कि बैंड के लिए गांव की दूसरी लड़कियों से भी बात की गई। कुछ लड़कियों ने मना कर दिया और कुछ लड़कियों के परिवार वालों ने। नेहा इस बात को बार-बार कहती है कि यहां नेगेटिविटी बहुत ज्यादा है। लोग लड़कियों को आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट नहीं करते। कई बार परिवार भी पीछे ढकेलता है। लेकिन उन्हें इस काम में बहुत मजा आ रहा है।

मिशन मेरा गाँव आपको आपकी संस्कृति और परम्परों से जोड़ने का एक माध्यम है लिहाज़ा हम आपको पहाड़ के अनसुने अनजाने शख्सियतों को आपसे इस मंच पर मिलवाते हैं ताकि समाज में उत्तराखंड के गाँव की तस्वीर सामने ला सकें

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