देवताओं और कुल देवियों के भी पलायन का साक्षी है उत्तराखंड !!!

पलायन की मार झेल रहे उत्तराखंड के गांवों के लोक-देवता अपने-अपने मंदिरों में बंद भक्तों की राह देख रहे हैं। साल में एक बार गांवों में पूजा के समय ये मंदिर खुलते है। एक दिन की रौनक होती है और फिर लोग अपनी-अपनी मंज़िलों की ओर लौट जाते हैं। बीते समय में कुछ ऐसा भी हुआ कि जो लोग अपने उजड़ चुके गांवों में नहीं लौट रहे, उन्होंने शहरों में अपने देवता को स्थापित कर लिया। लोगों के लोक देवताओं ने भी पलायन कर लिया।

पहाड़ों में दो सौ से अधिक लोक देवियां और देवता हैं। इनमें नंदा देवी, राज राजेश्वरी, झाली-बाली देवी, ज्वाल्पा, सुरकंडा, भद्रकाली, बाराही आदि हैं। इसी तरह गोलू देवता, ऐड़ी देवता, भैरव, नृसिंह देवताओं के कई मंदिर हैं। लोक देवताओं पर बारीकी से अध्ययन करने वाले जानकारों के मुताबिक लोग मानते हैं कि उनके देवता रात्रि में अपने क्षेत्र का भ्रमण करते हैं और उसे सभी तरह की दैहिक, दैविक और भौतिक आपदाओं से मुक्त करते हैं। उन्हें भयंकर आकृति वाले वन देवता के रूप में माना जाता है। उनकी पहचान एक योद्धा के रूप में भी है।

पहाड़ों की रग-रग से परीचित सामाजिक कार्यकर्ता भी मानते हैं कि लोगों ने अपने गांवों से तो पलायन किया है, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए लोक देवताओं को तंदरुस्त कर दिया है। गांव में रह जाने वाले इक्का-दुक्का परिवार इन मंदिरों पर दिया-बत्ती करते हैं। यही नहीं पलायन की मार से सबसे अधिक प्रभावित पौड़ी में तो छोटे-छोटे मंदिरों की समितियां हैं, प्रवासियों के भेजे गये पैसों से जिनकी अच्छी-खासी कमाई होती है।

दरअसल पहले लोग साल में एक बार लोक देवता को पूजने के लिए अपने गांव आते थे। लेकिन एक के बाद दूसरी पीढ़ी शहर में पैदा हुई, पली-बढ़ी, तो ये प्रवृत्ति भी खत्म होने लगी। इसी वजह से गांवों के इक्का-दुक्का परिवार भी पलायन कर गए। जब गांव में कोई नहीं रहा तो, लोक देवता को भी पलायन कर अन्यत्र विस्थापित होना पड़ा। पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के 700 से अधिक गांव पूरी तरह गैर-आबाद हो गए हैं। वे लोग अपने देवताओं को भी साथ ले गए होंगे।

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