मिलिए उत्तराखंड के असली सेंटा क्लाज़ से

 

मिशन मेरा गाँव आपको आज मिलवा रहा है पहाड़ के असली सेंटा क्लाज़ से जी हां पेशे से Teacher धनसिंह घरिया के बारे में यह famous है कि वे जब कभी अपने सगे-संबंधियों के घर जाते हैं तो वहां से पुराने कपडे़, किताबें मांगना नहीं भूलते। यहां तक की वे लोगों से पुराने अखबार, पत्र-पत्रिकाएं भी मांगकर ले जाते हैं। घरिया की पीठ पर हर समय एक bag रहता है जिसमें उनकी जरूरत की सामग्री ही नहीं, बल्कि लोगों से एकत्र की गई सामग्री भी होती है। वे इन सभी सामग्री को स्कूल में ले जाकर जरूरतमंद बच्चों में बांट देते हैं। वे बताते हैं कि ग्रामीण परिवेश के students को शिक्षकों की अधिक आवश्यकता है। इसलिए, वे ग्रामीण क्षेत्र के schools में रह कर ही बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं।

पोखरी ब्लॉक राजकीय इंटर कालेज गोदली के शिक्षक ने दो गरीब बालिकाओं को गोद लिया। उस शिक्षक ने कहा कि वह उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएंगे। यह वही शिक्षक हैं, जिन्हें इलाके में लोग ‘पेड़ वाले गुरुजी’ के तौर पर जानते हैं। उनका वास्तविक नाम धनसिंह घरिया है, वह पर्यावरण प्रेमी रहे हैं।

छह किमी लंबे मसोली-कलसीर पैदल मार्ग के किनारे भी उन्होंने थुनेर, अंगू, पांगर, देवदार, सुराई, टेमरू आदि प्रजातियों के पेड़ लगाए हैं। ताकि भूस्खलन पर अंकुश लग सके। पेड़-पौधों में विशेष रुचि रखने के कारण क्षेत्र में लोग घरिया को ‘पेड़ वाले गुरुजी’ के नाम से पुकारते हैं। इसके अलावा कहीं जंगल में आग लगी देखते हैं तो तुरंत उसे बुझाने दौड़ पड़ते हैं

राइंका गोदली में घरिया की नियुक्ति वर्ष 2007 में हुई थी। तब से वे निरंतर इस अभियान में जुटे हैं। गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वह बदरीनाथ धाम पहुंचकर वहां बिखरे पॉलीथिन कचरे की सफाई करते हैं। वर्ष 2014 में श्री नंदा देवी राजजात की समाप्ति के बाद उन्होंने वेदनी बुग्याल पहुंचकर स्वच्छता अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने स्वयं के खर्चे पर 15 क्विंटल कचरा एकत्रित किया।

वही दूसरी ओर इन्होंने इंदू व जमुना नाम की बालिकाओं को अपने खर्च पर पढ़ाने का जिम्मा उठाया।

घरिया के बारे में यह कहा जाता है कि वह हर साल गरीब बालिकाओं की Education के लिए उन्हें गोद लेते हैं। उन्होंने क्षेत्र की दो बालिकाओं को पढ़ाने के लिए गोद लिया जिनका नाम इंदू व जमुना की पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं है, जिसके कारण उन्होंने दसवीं के बाद अपनी पढ़ाई बंद कर दी थी, लेकिन दोनों में शिक्षा के प्रति लगन थी और आगे पढ़ना चाहती थीं। इसका पता घरिया जी को चला तो उन्होंने दोनों ही बालिकाओं की पढ़ाई का जिम्मा उठाने का ऐलान किया। दोनों बालिकाओं को स्कूल ड्रेस देकर पूजा-पद्धति से उनका नामाकंन राइका गोदली में करवाया। दरअसल हमारे समाज में उपकारी और संवेदनशील लोगों की कमी कभी नहीं रही है बस उनका काम खामोशी से अंजाम पर पहुंचता रहता है…लेकिन हमारी कोशिश है कि ऐसे समाज के आदर्श व्यक्तित्व का सम्मान ज़रूर होना चाहिए।

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